Saturday, September 30, 2006
श्रीमद्भगवद्गीता अब यहाँ पर उपलब्ध है!
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RC Mishra
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Sunday, September 24, 2006
अध्याय १: श्लोक ४४, ४५।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
O Krishna! maintainer of the people, I have heard by disciplic succession that those who destroy family traditions dwell always in hell. Alas, how strange it is that we are preparing to commit greatly sinful acts. Driven by the desire to enjoy royal happiness, we are intent on killing our own kinsmen.
हे जनार्दन! जिनका कुल धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं। हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं॥४४-४५॥
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RC Mishra
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Saturday, September 23, 2006
अध्याय १: श्लोक ४२, ४३।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिन्डोदकक्रियाः॥४२॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३॥
वर्णसङ्कर कुलघातियों को और कुल को नरक मे ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वञ्चित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं। इन वर्ण सङ्करकारक दोषों से कुल घातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ॥४२-४३॥
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4:48 PM
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Friday, September 22, 2006
अध्याय १: श्लोक ४०, ४१।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्न्मधर्मोऽभिभव्त्युत॥४०॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुश्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥४१॥
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल मे पाप भी बहुत फ़ैल जाता है। हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियोँ के दूषित हो जाने पर वर्ण सङ्कर उत्पन्न होता है ॥४०-४१॥
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Thursday, September 21, 2006
अध्याय १: श्लोक ३८, ३९।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
O Janardana! although these men, their hearts overtaken by greed, see no fault in killing one's family or quarreling with friends, why should we, who can see the crime in destroying a family, engage in these acts of sin?
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रो से विरोध करने मे पाप को नही देखते तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिये चिचार क्यों नही करना चाहिये? ॥३८-३९॥
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Sunday, September 17, 2006
अध्याय १: श्लोक ३६, ३७।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥३६॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्न्ता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे? ॥३६-३७॥
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8:13 PM
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Sunday, September 3, 2006
अध्याय १: श्लोक ३४, ३५।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥३४॥
एतान्न् हन्तुमिच्छामि घ्न्तोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराजस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५॥
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले, तथा और भी सम्बन्धी लोग हैँ। हे मधुसूदन मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता; फ़िर पृथ्वी के लिये तो कहना ही क्या है।
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RC Mishra
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9:44 AM
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