गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita

गीता भगवान् का ह्रदय है| उन्होंने स्वयं कहा है 'गीता मे ह्र्दयं पार्थ' यह सर्वशास्त्रमयी है, क्योंकि यह वेद-तत्तवार्थ का निचोड़ है|

Sunday, May 25, 2008

अध्याय ४ श्लोक ०५-०६

अध्याय ४ श्लोक ०५-०६

Posted by RC Mishra at 8:47 PM  

Labels: Chapter 4 । अध्याय ४

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